अंतर्मंथन

कितना बदल गया संसार --

 कभी दो कमरों में छह जनें रहते थे,अब छह कमरों में दो जनें रहते हैं। घरवाले तकलीफ़ तब भी सहते थे,घर के बुजुर्ग दुखी अब भी रहते हैं। मकां छोटा था पर दिल बड़...
clicks 7  Vote 0 Vote  11:30am 1 Dec 2021

ज़िंदगी का सफ़र, अविरल अनवरत --

 ज़िंदगी का सफ़र वक्त के वाहन पर होकर सवार चलता जाता है अविरल, अनवरत।  सफ़र की पगडंडी में आते हैं कई मोड़।  हर एक मोड़ पर दिखती है एक नयी डगर।  ...
clicks 25  Vote 0 Vote  11:00am 24 Nov 2021

अच्छे दिन फिर आने लगे हैं---

 अच्छे दिन शायद फिर आने लगे हैं, लोग मिलते ही हाथ मिलाने लगे हैं।  कोरोना के डर से हुए निडर इस कदर,कि दोस्तों को फिर गले लगाने लगे हैं।   शादियां भ...
clicks 38  Vote 0 Vote  3:00pm 18 Nov 2021

दीवाली का बदलता रूप -

ना मैं कहीं गया, ना कोई मेरे घर आया,क्या बताऊँ, दीवाली का पर्व कैसे मनाया। ना कोई गिफ्ट ना ग्रीटिंग कार्ड ना लैटर,ना कोई ई मेल ना कोई फोन ही आया।कभी जाते थ...
clicks 43  Vote 0 Vote  12:02pm 6 Nov 2021

करवा चौथ और दीवाली की सफाई --

रावण के जलते ही पत्नी हमें काम पर लगा देती है, दीवाली की सफाई के नाम पर हाथ में झाड़ू थमा देती है। हमने पत्नी से कहा,  भई कभी करवा चौथ का व्रत नही ...
clicks 62  Vote 0 Vote  12:43pm 25 Oct 2021

शिक्षित होकर भी अशिक्षित हो गया --

 आदि मानव जब शिक्षित हो गया,शिक्षित होकर वो विकसित हो गया। विकसित होकर किये ऐसे कारनामे कारनामों से खुद प्रतिष्ठित हो गया।    प्रतिष्ठित होकर जु...
clicks 62  Vote 0 Vote  1:50pm 11 Oct 2021

विश्व बुजुर्ग दिवस --

 पार्क में एक पेड़ तले दस बुज़ुर्ग बैठे बतिया रहे थे,सुनता कोई भी नहीं था पर सब बोले जा रहे थे ! भई उम्र भर तो सुनते रहे बीवी और बॉस की बातें,दिन मे चुप्प...
clicks 253  Vote 0 Vote  10:00am 1 Oct 2021

बुढ़ापा और एकल परिवार --

 एक ज़माना था जब हम गांव में रहते थे। घर के आँगन में या बैठक में घर के और पड़ोस के भी पुरुषों को चारपाई पर बैठ हुक्के का आनंद लेते हुए गपियाते हुए देखते थे। अ...
clicks 55  Vote 0 Vote  3:40pm 21 Sep 2021

ज्ञान बाँटने से बढ़ता है --

 बुजुर्गों से सुनते थे अनुभव अर्जित ज्ञान की बातें। और यह भी कि  ज्ञान बांटने से बढ़ता है, वरना एक दिन वही ज्ञान ज्ञानी के साथ ही मिट जाता है। ...
clicks 118  Vote 0 Vote  12:00pm 9 Sep 2021

और, और, थोड़ा और --

 रोज़ सोचते हैं कल बदल लेंगे, रोज़ थोड़ा और निकल आता है।  इस और और के चक्कर में,इंसान का सारा जीवन ही निकल जाता है।  और अनंत है असंतुष्टि का ...
clicks 131  Vote 0 Vote  11:30am 6 Sep 2021
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